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ओलम्पिक नाउ: कर्नल क़ुर्ट्ज़ और हम

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मैं पिछले कई महीनों से एक लेख लिखना चाहता था लेकिन मेरी दुविधा यह थी कि मेरे मन मे उस लेख की संरचना अंग्रेजी में ही बन पारही थी। शायद उसका मूलतः कारण यही था कि मैं जिन विचारों को लिपिबद्ध करना चाहता था वह एक अंग्रेजी फ़िल्म के मुख्य पात्र द्वारा 4 मिनट तक बोले गए एक लंबे संवाद पर आधारित था। वह यदि सिर्फ अंग्रेज़ी में बोला गया एक लंबा चौड़ा संवाद होता तो मैं पहले ही प्रयास में उसे हिंदी में आत्मसात कर लेता लेकिन क्योंकि वह संवाद से ज्यादा दार्शनिकता की गूढ़ता से लिप्त एक संभाषण है, इसलिये उसकी मौलिकता को हिंदी की वर्णमाला में पिरोना मेरे लिए असाध्य हो रहा था । आज मैंने एक और प्रयास किया है ताकि हिंदीभाषी, पात्र द्वारा व्यक्त किये गए दर्शन पर गंभीरता से मनन कर सके।

मैने जब 80 के दशक में, शायद 1985 में, फ्रांसिस फोर्ड कॉपपोल की ‘अपोकलीपसे नाउ’ पहली बार देखी थी, तो मैं अंदर से हिल गया था। 1979 में, जब यह फ़िल्म, जो कि जोसफ कौनराड के लघु उपन्यास ‘हार्ट ऑफ डार्कनेस’ से प्रेरित थी, आयी थी तब वह बॉक्स आफिस पर न तो सफल ही हुई थी और न ही फ़िल्म समीक्षकों द्वारा ज्यादा सराही गई थी। किंतु जैसे जैसे समय बीतता गया, लोगो ने न सिर्फ उसे सराहा बल्कि उसे अब एक क्लासिक और युद्ध की पृष्ठभूमि पर अशांत करने वाली, सर्वश्रेष्ठ कृति माना जाता है। यह फ़िल्म कहानी कहती है अमेरिकी सेना के कैप्टेन विल्लार्ड(मार्टिन शीन) की, जो वियतनाम से युद्ध मे भाग ले रहा है। उसको आदेश मिलता है कि उसे, कम्बोडिया की सीमा पर स्थित कर्नल क़ुर्ट्ज़, जो कि एक मेघावी अमेरिकी फौज का अफसर है, के ठिकाने पर जाकर, उसकी अतिशय पूर्वाग्रह(एक्सट्रीम प्रेज्यूडिस) से हत्या करनी है। उच्च अधिकारी उसे बताते है कि कर्नल क़ुर्ट्ज़, ने अपना मानसिक संतुलन खो दिया है और वह वहां की स्थानीय जनजाति और कुछ अमेरिकी भगौड़े सैनिकों के साथ, वियतनामी सेना के विरुद्ध, पाशविक तरीके से, अनाधिकृत, नृशंसात्मक गुरिल्ला युद्ध कर रहा है। क़ुर्ट्ज़ की बर्बरता से जहां सर्वत्र भय व्याप्त है वही पर स्थानीय जनजाति उसे देवतुल्य पूजते भी है।

कैप्टन विल्लार्ड, एक सैन्य नौका से नुंग नदी के रास्ते, ऊपर की तरफ कर्नल क़ुर्ट्ज़ के ठिकाने पर पहुंचने के लिए जाता है तो उसकी बीच मे मुलाकात लेफ्ट कर्नल किलगोरे से होती है। लेफ्ट कर्नल किलगोरे एक युद्धउन्मादी है, जो बीच युद्धभूमि में आमोद प्रमोद के साधनों की उपलब्धता से सहज है। उसके लिए युद्धभूमि में मनोविनोद व शौक की पूर्ति के लिए असैनिक वियतनामी ग्रामीणों की मारना कोई महत्व नही रखता है। विल्लार्ड को लेफ्ट कर्नल किलगोरे, नदी के उपर तरफ जाने के लिए सुरक्षा प्रदान करता है और अंत मे वह कर्नल क़ुर्ट्ज़ के ठिकाने पर पहुंच जाता है। वह पाता है कि क़ुर्ट्ज़ का इलाका एक वधशाला का बोध कराता है। वहां जगह जगह मृत शरीर व हड्डियां बिखरी पड़ी है। जब कैप्टन विल्लार्ड को पकड़ कर लाया जाता है तो कर्नल क़ुर्ट्ज़ को यह आभास हो जाता है कि विल्लार्ड यहां पर उसकी हत्या के उद्देश्य से आया है। क़ुर्ट्ज़, इस सबको लेकर दार्शनिक हो जाता है और तन्द्रात्मक बोध में, कैप्टन विल्लार्ड से कहता है,

“मैने विभीषिका देखी है, जो विभीषिका तुमने देखी है, लेकिन मुझे हत्यारा कहने का तुम्हे कोई अधिकार नही है। तुम्हे मेरी हत्या करने का अधिकार है, तुम्हारे पास यह करने का अधिकार है लेकिन तुम्हे,  मेरा न्यायाधीश होने का कोई अधिकार नही है। किन्ही भी शब्दो मे इतना सामर्थ्य नही है कि वे उन लोगों के लिए विभीषिका का चित्रण कर सके , जिन्हें यह नही पता है की विभीषिका होती क्या है। विभीषिका….. विभीषिका की मुखाकृति होती है…. और विभीषिका से मित्रता करना अनिवार्य है। विभीषिका और नैतिकता से उपजा संत्रास, हमारे मित्र है। यदि वे हमारे मित्र नही है तो वे शत्रु है, जिनसे भयभीत रहना चाहिए। वे हमारे वस्तुतः शत्रु है। मुझे याद है जब मैं स्पेशल फ़ोर्स में था, अब तो लगता है जैसे यह शताब्दियों पुरानी बात है, हम लोग बच्चो का टीकाकरण के लिए एक कैम्प में गये थे। हम लोग बच्चों को पोलियो का टीका लगा कर वापस लौट रहे थे तो एक बूढ़ा, हमारे पीछे भागता हुआ आया, जो रो रहा था। वह देख नही सकता था। हम लोग वापस उसी कैम्प लौटे। वे (हमारे शत्रु, वियतनामी लड़ाके) वहां आये थे और उन्होंने हर वह हाथ काट डाला था जिस पर हमने टीका लगाया गया था। ढेर लगा हुआ था। वहां छोटे छोटे कटे हाथों का ढेर लगा हुआ था। और मुझे याद है कि मैं…मैं…मैं रोया था। मैं बूढ़ी दादी की तरह रोया था। मैं अपना जबड़ा निकाल कर फेंक देना चाहता था। मुझे नही समझ आरहा था कि मैं करना क्या चाहता हूँ। मैं इसे(घटना को) याद रखना चाहता हूँ, मैं इसे कभी भी भूलना नही चाहता हूँ। और फिर मुझे इन्द्रियबोध हुआ… जैसे मुझे कोई गोली लगी….. जैसे हीरे से मारा गया…. हीरे की गोली, जो सीधे मेरे माथे के बीचों बीच लगी। और मेरे अंदर एक विचार जाग्रत हुआ: हे भगवान….. इतनी  प्रवीणता… प्रतिभाशाला। इस कृत्य को करने का इतना दृढ़ संकल्प! परिपूर्ण, यथार्थ, संपूर्ण, पारदर्शी, विशुद्ध! तब मुझे बोध हुआ कि वे, हमसे ज्यादा सामर्थ्यवान है। वे दानव नही है फिर भी इसे झेल सकते है। वे मनुष्य है….. प्रशिक्षित संवर्ग। ये वे लोग है जिन्होंने पूरे मनोयोग से लड़ा है। इनका परिवार है, बच्चे है, इनकी अंतरात्मा सुभगता से भरी है… लेकिन उनके पास आत्मशक्ति है… यह सब करने की आत्मशक्ति। यदि मेरे पास इन लोगो(लड़ाके) की दस डिवीज़न हो तो यहां के क्लेश का अंत बहुत शीघ्र हो जाए। आपके पास ऐसे आदमी होने चाहिए जो नैतिक हो और साथ मे वे अपनी मूल प्रवृत्ति का उपयोग करते हुए, बिना किसी संवेदना के वध कर सकते हों…. बिना भावावेश के… बिना विचारफल के… बिना विचारफल के। क्योंकि यह विचारफल ही है, जो हमे हराता है।”

मैने जब पहली बार, मार्लोन ब्रांडों द्वारा कर्नल क़ुर्ट्ज़ का यह संभाषण सुना तो आधा तो मुझे समझ ही नही आया लेकिन जो भी समझा है, उसने मुझे सन्त्रासित कर दिया। ऐसा लगा जैसे मेरी रीढ़ की हड्डियों के बीच मे बर्फ पिघला कर डाल दी गई हो। मुझे यह अनुभूति हुई कि जहां कर्नल क़ुर्ट्ज़ की संतप्त आत्मा, इस विकृत युद्ध दर्शन को, संप्रेषित कर रही है, वहीं पर वह भयावह रुप से, मुझे अपने अंदर के अंधकार को देखने के लिए भी विवश भी कर रही है। 

मुझे नही मालूम क्यों, जब मैं कोरोना से पीड़ित होकर अस्पताल के भर्ती हुआ, तो अपने कमरे के शमशानी सन्नाटे में यह फ़िल्म, उसका यह 4 मिनिट का लंबा संवाद व अंत मे कैप्टन विल्लार्ड द्वारा कर्नल क़ुर्ट्ज़ की गर्दन काटने के वक्त, क़ुर्ट्ज़ द्वारा बोले गये अंतिम शब्द ‘विभीषिका… विभीषिका’ मुझे बार बार उद्वेलित करते रहे। मैं वहां अकेला, अपने प्रतिवेश की निस्तब्धता और सन्निकट मृत्यु को जानने व समझने के लिए संघर्षरत था। मेरे अंदर बहुत सारे प्रश्न दुर्निर्धार्य कर रहे थे। मैने वहां अपने आपको नितांत एकाकी पाया और मैं मानसिक रूप से टूटने लगा था। ऐसे में मेरे अस्तित्व का अर्थ व उसके औचित्य केअभिप्राय को समझने के लिए मैने अपने भूतकाल की पुनः यात्रा की, उसके एक एक अर्गला को खटखटाया, अपने वर्तमान की गुढ़ार्थना की और देहलोक व इहलोक में अपने भविष्य को समझने की कोशिश की। इसी उधेड़बुन में मैं जब यह सब कर रहा था तभी अचानक मेरे ज्ञानचक्षु खुले और समझ में आया कि विभीषिका से मित्रता क्या होती है और कर्नल क़ुर्ट्ज़ का ‘विभीषिका की मुखाकृति होती है’ से अभिप्राय क्या था!

मुझे यह बड़ा स्पष्ट था कि जब मैं अनिश्चितता के अंबर के नीचे, अपने जीवन का विच्छेदन कर रहा था तो वह, एक आत्म अन्वेषण के प्रयास से कहीं ज्यादा था। मेरे इस प्रयास का जन्म अवचेतन रूप से, अविदित भय के कारण हुआ था। मैने अपने आपको, अपने से लिपटे अंधकार से आतंकित कर लिया था। मैं भयग्रस्त था। मुझे उस पल समझ आगया कि मैं जिस मनोस्थिति से गुजर रहा हूँ वह भय की नही है, बल्कि यह तो मेरा परिचय विभीषिका से है। वास्तविकता तो यह थी कि विभीषिका मेरे सामने थी,  जिसे मैं ही नही समझ पाया था। मुझे यह समझने में बहुत समय लगा। एक बार विभीषिका के सत्य को स्वीकार कर लेने पर जब उसको एक रूप मिला और मेरी तरह ही अस्थावर हो गई तो मैने अपने अस्तित्व को, अवचेतन रूप में कर्नल क़ुर्ट्ज़ की आत्मा में विलीन कर दिया। मैने अपने चित्त को निर्विकार कर, विभीषिका को अपना मित्र बना लिया।

जब मैं, विभीषिका को गले लगाने के लिए अपनी यथास्थिति का परित्याग कर रहा था तब मैं बहुत डरा हुआ था। लेकिन जैसे ही वह क्षण गुजरा, मुझे सुबोध हो गया कि आप विभीषिका से पृथक नही रह सकते है। आप, उसकी उपेक्षा नही कर सकते है क्योंकि यदि विभीषिका आपकी मित्र नही है तो वह आपकी ऐसी शत्रु है जो न सिर्फ भयानक है बल्कि सर्वशक्तिमान भी है। आपको विभीषिका से मित्रता करना वह अवसर प्रदान करता है जिससे आप अपने अंदर के अंधकार को उजाला दे सके। वह भय को आपकी संवेदनाओं और सहज प्रवृत्ति का बलात्कार करने से रोकता है। वह आपको, प्रतिद्वंद्व की स्थिति में किये गए कार्यकलापों पर विचारफल देने से रोकता है। उससे मित्रता आपको वह धरातल प्रस्तुत कराती है जहां आप विभीषिका का सामना विभीषिका से, बिना निनैतिक हुये कर सकते है। 

मुझे जीवन की संध्याकाल में यह अब परिलक्षित हो गया है कि यदि प्रश्न आपके अस्तित्व पर खड़ा है तो मृत्यु से पहले, जीवित रहने का यही सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। आप यदि ऐसे संघर्ष के बीच में है, जहां संघर्ष में विजित होना ही, आपके अस्तित्व की रक्षा व सुरक्षा को कवच प्रदान करती है तो विभीषिका से मित्रता करना ही एकमात्र उपाय है। हम भारत के सनातनियों के लिए यह समझना बहुत जरूरी है कि हमारे लिए कर्नल क़ुर्ट्ज़ की सराहना व उसका अनुसरण करना कितना आवश्यक है। उसका युद्ध दर्शन और उसकी विभीषिका के प्रति निष्कलंक निष्ठा, युद्ध मे जीतने व अपने शत्रुओं के सर्वनाश किये जाने के विश्लेषण को एक अलग स्तर पर प्रतिस्थापित कर देती है।

यहां मैं, यह भी स्वीकार करूंगा कि विभीषिका के विपरीत, शांति से मित्रता हमको ज्यादा सुभीता प्रदान करती है लेकिन समय के बीतने के साथ, शांति से की गई यह मित्रता, विभीषिका से मित्रता करने की हमारी मौलिक प्रवृत्ति का ह्रास कर देती है और यही ह्रास हमको संघर्ष के समय, आसान शिकार बना देती है। यह हमको एक ऐसा अधूरा व्यक्तित्व, अनुवित बना देती है जो प्रतिघात करने के भी योग्य नही होता है। विभीषिका का अनादर व उसकी उपेक्षा किये जाने से, उससे मित्रता किये जाने का जो भाव हममें लोप हो गया है उसी ने हमको शत्रुओं द्वारा घेरे जाने के प्रवृत्त बना दिया है। उसी ने हमारे सर्वनाश के द्वार खोले है और हमने द्वार पर ही शत्रुओं को प्रतिउत्तर देने की जगह, पहली सुविधा में भाग जाने की प्रवृत्ति को अपने अंदर आत्मसात कर लिया है।   

मैं कहता हूँ कि हमे कर्नल क़ुर्ट्ज़ को अपना बनाना चाहिए और अपने अस्तित्व की रक्षा करने के लिए, विभीषिका के सत्य को स्वीकार कर, उसे आलिंगनबद्ध करना चाहिए। यह हमारे समाज को ही करना है, क्योंकि बिना उसके किये कोई भी विधि और व्यवस्था, अस्तित्व की सुरक्षा नही कर सकती है। यदि हम यह नही करते है तो फिर यहां से उखड़, सदुर दुनिया के किसी कोने में दुबक जाइये। हो सकता है कि कर्नल क़ुर्ट्ज़ के दर्शन से आप की बुद्धिकता आहत हो और वितृष्णा का भाव भी उपजे लेकिन यह याद राखियेगा की हम वह लोग है, जिन्होंने क्रांतिकारियों के परिवार का उनके मरने या पकड़े जाने पर, सामाजिक बहिष्कार किया था, हम वह लोग है जो कश्मीर से बिना एक गोली चलाए भागते है और हम वही लोग है, जो अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए स्वयं के उत्तरदायित्व से विमुख हो शासकीय संरक्षण को दायी बनाते है।

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