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राजनीति में फँस क्या हम इतने अमानवीय हो गए हैं

by Nitin Tripathi
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राजनीति में फँस क्या हम इतने अमानवीय हो गए हैं कि जब तक किसी अपने पर मुसीबत न आए हम राजनैतिक चश्मे से ही देखते हैं?

 

यूक्रेन में युद्ध आरम्भ होते ही पहले सेकंड से एक खेमा लग गया कि कैसे भी हो भारतीय स्टूडेंट्स वहाँ फँस जाएँ, मर जाएँ तो सरकार को घेरा जाए. एक खेमा इसी बहाने कि एयर इंडिया का टिकट पचास हज़ार का है महँगा है सरकारी होता तो सस्ता होता के बहाने निजी करण को कोसने लगा. इनका उद्देश्य वहाँ फँसे बच्चों की जान बचाना नहीं बल्कि भारत में अपनी सरकारी नौकरी जिसमें काम न करना पड़े को बचाना था. हालत यूक्रेन की यह है कि फ़्लाइट छोड़िए बच्चे पचास किमी टैक्सी के पचास हज़ार देने को तैयार हैं पर वह भी उपलब्ध नहीं है.
एक गैंग लग गया पहले दिन से झूठी खबरें फैलाने में कि सैकड़ों भारतीय बच्चों का अपहरण कर लिया गया हैं, लड़कियों को सैनिक उठा ले गए हैं. चूँकि वो बच्चे इनके नहीं हैं तो उनके लिए फ़ेक न्यूज़ लिख थोड़े लाइक शेयर ही ले लिए जाएँ. यदि असल में ऐसा हो जाए तो पूरा यक़ीन है प्राइवट में यह लोग जश्न मनाएँ पार्टी करें. कोई बड़ी बात नहीं इनमे इक्का दुक्का लोग ताबीज़ बांध रहे हों कि कैसे भी कुछ भारतीय यूक्रेन में मरें तो इन्हें मज़ा आए.
कम दूसरे पक्ष वाले भी नहीं हैं. आज जब ज़रूरत रेस्क्यू की है तो वह इन बच्चों के कॉम्पटिशन निकाल पाने की वजह से विदेश में पढ़ने का मज़ाक़ उड़ा रहे हैं. खुद ऐसे एक कंपटीशन में बैठ देख लीजिए समझ आ जाएगा क्या तैयारी होती है क्या मेंटल प्रेसर होता है. बाक़ी यह भी कि वह छात्र कोई अवैध नागरिक नहीं भारत के क़ानून का पालन करते हुवे ही पढ़ने गए हैं और वह भारत के क़ानून के तहत ही डॉक्टर बन रहे हैं.
भारतीय दूतावास की एडवाइज़री नहीं मानी लोग ऐसे बोलते हैं जैसे उन्हें पता ही नहीं सरकारी विभाग कैसे कार्य करते हैं. पूरी दुनिया के दूतावास जब अपने नागरिकों को निकालने की कोशिश कर रहे थे, आख़री सप्ताह तक भारतीय दूतावास ने एक औपचारिक वॉर्निंग तक न इसू की. अंतिम मौक़े पर भी उनकी वॉर्निंग इतनी हल्की थी कि यदि ज़रूरी न हो तो भारत आ जाओ – ऐसी वॉर्निंग सुन जो आ रहा हो वह भी न आए. बाक़ी विदेश में रहते हुवे जयादतर भारतीयों का भारतीय दूतावास की ईमानदारी पर उतना ही भरोसा होता है जितना भारत में पुलिस पर.
कृपया शांत हो जाइए. यदि स्वयं राहुल गांधी / अखिलेश यादव / बिधायक लेवेल के नेता नहीं हैं तो क्या मिल रहा है किसी को मुसीबत में देख ताली बजाने से. क्या मिल रहा है जो फँसे हैं उनकी मृत्यु / बलात्कार की फ़र्ज़ी खबरेंउड़ाने से. बस यही न कि जो फँसे हैं वह आपके अपने सगे नहीं हैं.
अभी भी यूक्रेन में लगभग तीन हज़ार लोग फँसे हैं. वह जो भारत के नागरिक हैं. उनका मज़ाक़ उड़ाने / अफ़वाहें फैलाने की जगह उनकी सकुशल घर वापसी की कामना कीजिए. सहयोग / सलाह दे सकते हैं वह दीजिए. अंतर्राष्ट्रीय स्तर की नेतागीरी उस लेवेल के नेताओं को करने दीजिए.

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