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सच में ही भारत खाद्यान के मामले में स्वनिर्भर है या कुपोषित है

by Umrao Vivek Samajik Yayavar
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सच में ही भारत खाद्यान के मामले में स्वनिर्भर है या कुपोषित है

 

फेसबुक में अनेक फेसबुक-मित्र या तो स्वयं लिख रहे हैं या दूसरों का लिखा चिपका रहे हैं। और बता रहे हैं कि भारत खाद्यान के मामले में न केवल स्व-निर्भर है बल्कि दुनिया के दूसरे देशों के लोगों का भी पोषण करने में सक्षम है। मुझे नहीं पता कि इन सब बातों का आधार बिना आधार गौरव महसूस करने की सिर्फ कोरी भावुकता होती है या कुछ गंभीर गणना वगैरह भी करते हैं। यदि देश को मजबूत करना है, यदि देश के लोगों को मजबूत करना है तो हवाई बातों से इतर यथार्थ के आधार पर सोचना विचारना चाहिए तभी जमीन पर कुछ ठोस कर पाने की स्थिति की ओर कुछ कदम चल पाना संभव हो पाता है। आपका पेट भरा है, आप पोषित हैं इसलिए पोषित होने के अहंकार को जीने की लिप्सा के चक्कर में संवेदनशील नहीं हो पाइए, तो जो बहुत करोड़ों लोग कुपोषित हैं उनका माखौल उड़ाने की असंवेदनशीलता तो कम से कम नहीं ही रखिए।

 

पहले बात करते हैं गेहूं पर।
भारत की जनसंख्या लगभग 140 करोड़ है। इनमें से एक भाग जो बंगाल, दक्षिण-भारत के राज्यों, बंगाल, ओडिशा व महाराष्ट्र में रहते हैं, तो इनमें से महाराष्ट्र को छोड़ बाकी राज्यों में लगभग सभी लोगों का मुख्य भोजन चावल है। इसलिए दक्षिण-भारत के राज्यों, बंगाल ओडिशा, महाराष्ट्र में यह मानकर चला जाए कि एक व्यक्ति भी पूरे साल में गेहूं का एक दाना भी नहीं खाता है। इन राज्यों की जनसंख्या लगभग 55 करोड़ है, मतलब यह कि 140 करोड़ लोगों में से 55 करोड़ लोग पूरे साल में गेहूं का एक दाना भी नहीं खाते हैं।
140 करोड़ में 55 करोड़ निकालने के बाद बचे 85 करोड़ लोग। इनमें से 50 करोड़ लोग (जबकि इससे बहुत कम ही होंगे) होंगे जो एक दिन में लगभग छः रोटी खाते होंगे, लगभग 35 करोड़ लोग (जबकि इससे बहुत अधिक ही होंगे) जो एक दिन में लगभग 12 रोटी खाते होंगे। (गांवों के लोग व मजदूर वर्ग बहुत रोटी खाता है)। एक रोटी को लगभग 50-60 ग्राम की माना जा रहा है (पतली रोटी माना जा रहा है, जबकि बहुत लोग मोटी व भारी रोटी खाते हैं)।
50 करोड़ लोगों की दिन भर में 6 रोटी व 35 करोड़ लोगों की दिन भर में 12 रोटी। पतली रोटी माना जा रहा है, बावजूद इसके कि करोड़ों लोग काफी मोटी रोटी खाते हैं वह भी ठीक ठाक संख्या में।
हिसाब लगाने पर भारत में गेहूं की जरूरत है लगभग 22 करोड़ मीट्रिक-टन की, जबकि भारत में गेहूं का कुल उत्पादन ही लगभग 10 करोड़ मीट्रिक-टन है। मतलब यह कि जितनी जरूरत है उसके आधे भी कम उत्पादन होता है। जबकि 55 करोड़ लोगों के बारे में यह माना गया है कि ये लोग साल भर में किसी भी प्रकार से गेहूं का एक दाना भी नहीं खाते हैं, और 85 करोड़ लोगों के बारे में भी यह माना गया है कि रोटी के अलावा किसी और प्रकार से गेहूं नहीं खाते हैं।
भारत में गेहूं का कुल उत्पादन ही प्रति व्यक्ति लगभग 75 किलो के आसपास होता है, जो कि एक दिन का लगभग 200 ग्राम होता है, मतलब एक व्यक्ति को पतली-पतली चार रोटी वह भी दिन भर में। जबकि दुनिया के बहुत देशों में प्रति व्यक्ति उत्पादन इसका 10 गुना या अधिक तक भी होता है।
अब आते हैं चावल पर।
यह मानकर चलते हैं कि 55 करोड़ लोग चावल खाते हैं। दुनिया में जिन देशों के लोग पूरी तरह से चावल पर निर्भर हैं, वहां एक आदमी साल में औसतन लगभग 300 किलो चावल खाता है। भारत में इस औसत को भी कम करके 250 किलो मान लेते हैं, बावजूद इसके कि भारत में गांव के लोगों व मजदूर लोग अधिक खाते हैं। 55 करोड़ लोगों के लिए चावल की जरूरत हुई लगभग 14 करोड़ मीट्रिक-टन सालाना, लेकिन भारत में चावल का कुल उत्पादन ही होता है लगभग 10 करोड़
गेंहूं हो या चावल, सरसरी गणना करने में यह माना गया है कि जो गेहूं खाते हैं वे चावल का एक दाना नहीं खाते हैं, जो चावल खाते हैं वे गेहूं का एक दाना नहीं खाते हैं। खाने की मात्रा भी कम करके गणना की गई है, जबकि वास्तविक मात्रा अधिक ही है। ऐसा भी नहीं होता है कि जो चावल खाते हैं वे किसी भी प्रकार से गेंहूं नहीं खाते हैं या जो गेहूं खाते हैं वे किसी भी प्रकार से गेहूं नहीं खाते हैं। वास्तव में होता यह है कि चावल खाने वाले लोग गेहूं खाते ही हैं भले ही गेहूं रोटी के प्रकार में न खाते हों, ऐसे ही जो रोटी खाते हैं वे भी किसी न किसी रूप में चावल खाते ही हैं। यदि सभी बिंदुओं को लेकर गणना की जाए तो गेहूं व चावल की खपत बहुत बढ़ जाएगी।
गेहूं व चावल दोनों में ही भारत देश स्व-निर्भर नहीं है, मतलब जितनी जरूरत है उतना उपलब्ध नहीं है। दालों के मामले में तो भारत की स्थिति बहुत ही अधिक खराब है। भारत में दालों का कुल उत्पादन प्रति व्यक्ति सालाना एक किलो (पौना किलो से भी कम है) भी नहीं है, मतलब प्रति व्यक्ति प्रति दिन 20 ग्राम से भी कम दाल।
सक्रियता के साथ स्वस्थ रहने के लिए मनुष्य को गेहूं चावल के अलावा भी बहुत कुछ चाहिए होता है। भारत में खाद्यान व पोषण की स्थिति बहुत ही अधिक खराब है, यहां तक कि करोड़ों बच्चे गर्भावस्था के समय से ही कुपोषित रहते हैं। रासायनिक-खाद व रासायनिक-कीटनाशक की बात नहीं भी कीजिए तब भी कृषि के लिए प्रयुक्त होने वाला पानी तक भी बहुत दूषित है। यदि हम वास्तव में अपने देश व समाज के लोगों के लिए थोड़ा सा भी संवेदनशील है, ईमानदार हैं तो हमें खाद्यान के संदर्भ में पानी इत्यादि के संदर्भ में बहुत अधिक गंभीरता से सोचना व करना पड़ेगा। हवाई लफ्फाजी, बकैती इत्यादि से किसी देश व समाज को समाधान नहीं मिलता है।
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