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लोग चीते के कंठ में शेर की दहाड़ खोज रहें हैं।

रिवेश प्रताप सिंह

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विचित्र यह कि लोग ‘बांसुरी’ की कंठ से ढोल की आवाज सुनने के लिए कान टिकाकर बैठे हैं। जी हां! लोग चीते के कंठ में शेर की दहाड़ खोज रहें हैं। उन्हें इस बात से कोई लेना देना नहीं कि उसकी रफ्तार 100 किलोमीटर प्रति घंटा है‌… उन्हें बस उसके कंठ से दहाड़ की ध्वनि चाहिए। हांलाकि जीव विज्ञानी बतावें हैं कि चीता, बिल्ली के परिवार का सदस्य है और उसकी कंठ भी म्याऊं हैं।

आदमी हो या जानवर उसका “काम” बोलना चाहिए आवाज तो बड़े बड़े की म्याऊं ही होती हैं। हमारे पूर्व प्रधानमंत्री भी बड़े अर्थशास्त्री थे भले उनकी कंठ भी म्याऊं थी। हांलाकि अब तो सिर्फ दहाड़ सुनते-सुनते ऐसा लगता है कि मानों हम चिड़िया घर के सुपरवाइजर हैं।

मित्रों! सर्वत्र चीते की चर्चा के साथ मैंने भी चीते के इतिहास को भीतर तक झांकने का प्रयास किया जहां उसके आकार-प्रकार, आचार-व्यवहार, रफ्तार- गिरफ्तार, रंग- रूप आदि के विषय में पढ़ा। जहां भारत से लगायत समूचे एशिया तथा लगभग पूरे विश्व में इनकी समाप्ति/विलुप्तता के विषय में जानने की दुखद सूचना मिली।

तमाम जानकारी एवं सूचनाओं के बाद चीतों के विलुप्तता की जो सबसे गंभीर बात सामने आयी वो यह कि इनकी मादाएं अपने गर्भ से लेकर प्रसव एवं प्रसव उपरांत अपने…. लगभग नौ बच्चों की देख-रेख को लेकर बेहद चुनौतियों का सामना करती हैं। जहां, बच्चों की सुरक्षा के साथ उनके पोषण तथा खुद के पोषण का ख्याल रखने की जिम्मेदारी… बेहद एकांकी एवं महत्वपूर्ण है। तथा उसमें सबसे गंभीर, निन्दनीय तथा चिंतनीय यह कि उनके नरों की अपने परिवार के प्रति जिम्मेदारी! बिल्कुल ही गैर जिम्मेदाराना है। नर चीते मादाओं के ‘समीप एवं साथ’ सिर्फ समागम तक ही रहते हैं… उसके बाद वो अपने पुरुष मित्रों के साथ आवारागर्दी करते हैं। उन्हें अपने पत्नी, परिवार तथा अपने संतानो की परवरिश, पोषण तथा अपने वंश परिवर्धन की कोई चिंता नहीं रहती।

मित्रों! जिस जगह पुरुष अपने परिवार के प्रति इतना गैर जिम्मेदार होगा ऐसे में उनके वंश का डूब जाना कोई आश्चर्य नहीं।
आशा करता हूं नव आगंतुक दुनियादारी तथा शिकार को छोड़कर अपने परिवार के साथ अपना कीमती समय न्योछावर करेंगे तथा अपने वंश के वृद्धि के प्रति जागरूक रहेंगे। तथा भारत को चीतों से समृद्ध करेंगे।

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