Home लेखक और लेखअजीत सिंह मैं जिस अस्पताल में हूँ

मैं जिस अस्पताल में हूँ

by Ajit Singh
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मैं जिस अस्पताल में हूँ वहाँ पर एक वर्ष से एक नर्स अपने ब्वायफ़्रेंड को दिखाने लेकर आती रहती थी।
हल्के प्रकार के ब्लड कैंसर से वह लड़का पीड़ित है। उसको शुरुआत में ही प्रोग्नोसिस बताते समय मैंने कहा था की बहुत सम्भव है की अगले 15 वर्ष में बीमारी आगे बढ़ जाय और ऐसा प्रायः देखा भी जाता है।
कुछ एक महीने बाद वह नर्स अकेले आयी और रोते हुए कहने लगी की मैं उससे शादी करना चाहती हूँ पर भविष्य को लेकर बहुत परेशान हूँ।
मैंने उससे कहा की क्या तुम कहीं और शादी कर लोगी तो इस नयी दुनिया में रम जाओगी?? क्या इसको भूलकर जीवन आगे बढ़ा पाओगी?
उसने कहा की लड़की को जहां बांध दो, वहीं रम जाती है, बच्चे हो जाते हैं, एक नयी दुनिया बन जाती है। लेकिन यदि मुझे सप्ताह में, महीने में या साल भर में भी एक बार भी उसकी याद आएगी तो मेरा मन अपराध बोध से भर जाएगा। मैं संतुष्टि से जीवन नहीं जी पाऊँगी।
उसने मुझसे कहा की क्या यह रिस्क मुझे लेना चाहिए?
मैंने कहा की एक डाक्टर के रूप में सलाह यह रहेगा की इतना भावुक निर्णय न लो, उसको खुद पता है की उसे क्या है?
उसने कहा की उसके ब्वायफ़्रेंड ने कहा है की यदि मुझे छोड़ भी दोगी मैं तुमको कोई दोष नहीं दूँगा।
अब उसने कहा की आप डाक्टर की तरह नहीं, घर परिवार की तरह बताइए।
मैंने एक साँस में कहा की जहां जाओगी वहाँ भी असंतुष्ट और अपराध बोध से भरा हुआ जीवन जीना है………. इससे अच्छा इसी के साथ सुखपूर्वक जी लो, जीवन मरण सब ईश्वर के हाथ हैं।
आज पुनः उस लड़के के साथ प्रकट हुई, लेकिन नर्सिंग ड्रेस से इतर साड़ी में, मंगलसूत्र पहने और माँग में सिंदूर लगाए…..

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