Home हमारे लेखकजलज कुमार मिश्रा संस्कृत का सम्मान

संस्कृत का सम्मान

by Jalaj Kumar Mishra
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संस्कृत का सम्मान सिर्फ सनातन का सम्मान करना ही नही बल्कि अपने पुरखों का भी सम्मान करना है। आज विश्व संस्कृत दिवस है। संस्कृत संसार की सबसे प्राचीन और देव भाषा है। संस्कृत भाषा में करीब 102 अरब 78 करोड़ 50 लाख शब्दों की विश्व में सबसे बड़ी शब्दावली है। आधुनिक युग में संस्कृत सबसे अधिक कम्प्यूटर के अनुकूल भाषा है। कर्नाटक में एक ऐसा गांव है जहां हर कोई संस्कृत में बात करता है। गांव का नाम मत्तूर जो शिमोगा जिले में है। संस्कृत को उत्तराखंड सरकार की आधिकारिक भाषा घोषित किया गया है।

अजादी के बाद बहुत छल पूर्वक संस्कृत को हाशिए पर धकेला गया। आज वामपंथी बिना संस्कृत जाने हमारे धर्म शास्त्रों के बारे में अनर्गल प्रलाप करते रहते हैं। दोष उनका नही सत्ता के चरित्र का है जिन्होंने हमारे धर्म को नष्ट करने का एक प्रकल्प चला रखा है।

एक षड्यंत्र का आज आप सभी से जिक्र करना चाहूँगा। आज देश के प्रधानमंत्री ने एक ओर जहाँ विश्व संस्कृत दिवस की हार्दिक बधाई दी है और दूसरी तरफ उनके ही शासन में उनके पार्टी द्वारा संचालित एक राज्य बिहार में संस्कृत भाषा को पढ़ाने पर अब पूर्णत: रोक लगा दिया गया है और ऊर्दू के अलावे फारसी और अरबी को वहाँ लागू कर दिया गया है। मूलतः देखा जाए तो विषय यह है कि 2005 में भाजपा जदयू की सरकार आने के बाद से ही प्राथमिक कक्षाओं से संस्कृत को समाप्त कर दिया गया। अब पाँचवी तक की कक्षाओं में जब संस्कृत नहीं है तो इसके लिए शिक्षकों की बहाली भी नहीं होगी। अर्थात प्राथमिक विद्यालयों में संस्कृत शिक्षक का पद समाप्त कर दिया गया। लेकिन उर्दू, फारसी और अरबी के शिक्षक अनिवार्य हैं जिस विद्यालय में एक भी मुस्लिम बच्चा हो और वर्तमान परिवेश में शायद ही कोई ऐसा विद्यालय होगा जिसमें मुस्लिमों की संख्या शून्य होगी। अर्थात प्रत्येक प्राथमिक विद्यालय में उर्दू के शिक्षक अवश्य होंगे। इसके अतिरिक्त अरबी और फारसी की पढ़ाई भी हो रही है। नयी बात जो एक इधर उभर कर सामने आयी है कि शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालयों में संस्कृत विषय की मान्यता समाप्त हो गई यानी कि अगर आपने उपशास्त्री( संस्कृत से 10+2) किया है तो आप बिहार में टीचर्स ट्रेनिंग नहीं कर सकते। हाँ अगर आपने उर्दू विषय से (आमिल) इंटर पास किया है तो आप इसके लिए योग्य माने जाएंगे। अर्थात संस्कृत पढ़ने वाला व्यक्ति टीचर्स ट्रेनिंग नहीं कर पाएगा। अर्थात संस्कृत वाले ट्रेंड नहीं हो पाएंगे और ट्रेंड नहीं होंगे तो आने वाली दिनों में शिक्षक नहीं होंगे। अर्थात् इस सरकार ने बिहार से संस्कृत को उखाड़ने की पूरी योजना रचना तैयार कर ली है।

स्वाभाविक है कि बच्चे संस्कृत क्यों पढ़ेंगे जब उसमें रोजगार ही नही होगा और यह काम हो रहा है उस भाजपा के शासन नेतृत्व में जिसपर हम‌ सभी को‌ भरोसा हैं कि वह सनातन के प्रहरी है।

मेरा व्यक्तिगत आप सभी से अनुरोध है कि संस्कृत विरोधी इस कदम के खिलाफ‌ आवाज बुलन्द करें! धर्म बचाने के लिए भाषा का बचना भी उतना ही जरुरी होता हैं।आप सभी आवाज उठाएंगे तो मौजूदा शासनतंत्र जनभावना का सम्मान कर शायद इस विषय में अपनी राय बनाये और संस्कृत को पुन: बहाल कर पाये!

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