शुङ्ग_क्रांति

देवेन्द्र सिकरवार

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प्रायः पुष्यमित्र के नेतृत्व में हुए सत्ता परिवर्तन को वामपंथी और पेरियारवादी ब्राह्मण विद्रोह और राष्ट्रवादी दृष्टिकोण रखने वाला वर्ग इसे राष्ट्रवादी विद्रोह कहता है।
वस्तुतः यह इससे कहीं बढ़कर था जिसके प्रभाव हिंद-यूनानी आक्रमण को रोकने के अतिरिक्त भी रहे जिन्होंने पूरे सामाजिक संगठन को बदल दिया।
दरअसल पूर्वी भारत के गणतंत्री क्षत्रियों का ब्राह्मणों में सामूहिक जात्युत्कर्ष परिवर्तन उसी युग मे हुआ, ऐसा राहुल सांकृत्यायन जी अपने ही प्रमाण से लिखा है कि उनके पूर्वज मल्ल गणक्षत्रिय थे अतः मलाव पांडे कहलाये। यह प्राचीन काल की वर्णपरिवर्तन परंपरा के अनुसार ही था जो व्यक्ति या समाज की शक्तिशाली स्थिति पर निर्भर करता था।
वस्तुतः पूर्वी भारत में गणक्षत्रियों के बाहुल्य वाला क्षेत्र का जातीय संतुलन कैसे बदला और ब्राह्मण-भूमिहार वर्ग संघर्ष कहाँ से उभरना शुरू हुआ उसके बीज इसी घटना में निहित हैं। अभी तक शुङ्गों व कण्वों की राजकीयप्रशासकीय नीति व उसके सामाजिक संगठन पर पड़े प्रभावों का अध्ययन नहीं किया गया परंतु उसके परिणाम बताते हैं कि परिणाम सामाजिक संरचना पर बहुत गहरे पड़े थे क्योंकि कण्वों के दौरान ही अजेय मगध इतना कमजोर हो गया कि वह फिर कभी भी आक्रांताओं का मुकाबला कर ही न सका क्योंकि सेना के लिए अब क्षत्रिय थे ही नहीं। यही कारण है शक, कुषाण जैसे आक्रांताओं ने आसानी से पाटलिपुत्र को रौंद दिया व लंबे समय उनकी अधीनता में रहा। छठ की सूर्यपूजा मगध पर सूर्यपूजक शक-मुरुण्डों के लंबे शासन के प्रभाव का सीधा लोक प्रमाण है।
मौखरियों व प्रतिहारों के कन्नौज आगमन से और राजपूतों की बसाहट से कुछ स्थिति बदली लेकिन यह पूर्वी क्षेत्र वैसा अजेय नहीं रहा जैसा कभी अतीत में था। हालांकि एक बार फिर इन जातियों में से कुछ ने सत्ता में भागीदारी के अनुसार वर्णपरिवर्तन कर लिया और ब्रह्मक्षत्रिय बन गए।
यह प्रक्रिया आज भी जारी है जहां राजस्थान के सुथारों, जो अतीत में कभी प्रतिहार वंशी राजपूत थे, फिर काष्ठशिल्पी बने और उनमें कई अब ब्राह्मण बन चुके।
इसी प्रकार भाट जो वस्तुतः सूत वर्ग के थे, वे आज ब्राह्मण घोषित हो गए हैं।
इसलिये पूर्वी भारत में प्राचीन व नवीन ब्राह्मणों के आधिक्य व पश्चिम-उत्तर में राजपूतों की प्रबलता के कारण हिंदू प्रतिरोध के दो केंद्र बन गए राजनैतिक-सामरिक केंद्र राजस्थान विशेषतः चित्तौड़ और धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतिरोध का केंद्र पूर्वांचल और विशेषकर बनारस बन गया था।
यही कारण है कि मैं पुष्यमित्र शुङ्ग के शासनकाल को मैं एक क्रांति कहता हूँ, जिसने तत्कालीन राजनीति ही नहीं भविष्य के सामाजिक संगठन को भी बदल दिया।
आज जब इन्हें जाति के नाम पर आपस में लड़ते और अपने ‘रज-वीर्य’ की शुद्धता की गारंटी लेते हुए देखता हूँ तो हंसी आती है कि किसे पता है कि कौन ब्राह्मण था, कौन क्षत्रिय और कौन सूत?
इतिहास के आईने में अपनी शक्ल देखी है?
कसम से! बहुत मनहूस दिखते हो।

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